अब कुछ मरम बिचारा हो हरि – Raidas ke Pad – रैदास/रबिदास के पद

अब कुछ मरम बिचारा हो हरि ….

।।राग रामकली।।

अब कुछ मरम बिचारा हो हरि।

आदि अंति औसांण राम बिन, कोई

न करै निरवारा हो हरि ।।टेक।।

जल मैं पंक पंक अमृत जल, जलहि

सुधा कै जैसैं।

ऐसैं करमि धरमि जीव बाँध्यौ, छूटै

तुम्ह बिन कैसैं हो हरि।।1।।

जप तप बिधि निषेद करुणांमैं, पाप

पुनि दोऊ माया।

अस मो हित मन गति विमुख धन,

जनमि जनमि डहकाया हो हरि।।2।।

ताड़ण, छेदण, त्रायण, खेदण, बहु

विधि करि ले उपाई।

लूंण खड़ी संजोग बिनां, जैसैं कनक

कलंक न जाई।।3।।

भणैं रैदास कठिन कलि केवल, कहा

उपाइ अब कीजै।

भौ बूड़त भैभीत भगत जन, कर

अवलंबन दीजै।।4।।

संदर्भ –

प्रस्तुत पद्यांश भक्तिकालीन निर्गुण काव्यधारा के ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख संत कवि रैदास द्वारा रचित है। अन्य पदों की

भांति इस पद का संकलन भी ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में किया गया है।

व्याख्या –

हे हरि! जीव, जगत, ब्रह्म आदि के मर्म के बारे में अब कुछ विचार कर लिया है। इस विचार का सार यह है कि आदि अर्थात्

जीवन के आरम्भ से लेकर उसके अवसान यानि अंत तक केवल राम नाम का ही आश्रय है।

जिस प्रकार अमृत रूपी विमल जल के साथ कीचड़ भी रहता है किन्तु सुधा रूपी जल के प्रभाव से वह कमल जैसे पुष्प भी

खिला सकता है। ठीक वैसे ही इस माया रूपी पंकिल जगत में आप का नाम अमृत जल के समान है। जिसके प्रभाव से करम

-धरम के बंधन में बंधा जीव मुक्त हो सकता है।

हे प्रभु! इस जगत में व्याप्त पाप और पुण्य की मनोभावना रूपी माया के दो रूपों ने जप-तप एवं अनेक विधि-विधानों जैसे

सांसारिक कृत्यों को मुझसे कराएं हैं। किन्तु अंततः मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि इस माया ने मुक्ति के नाम पर केव मेरे

मन को जन्म-जन्मांतर बहकाया है और वास्तविक धन यानि आपके नाम से विमुख रखा है, इसी कारण बार-बार इस माया

रूपी जगत में जीव फँसकर आवागमन के चक्र से मुक्त नहिं हो पाता।

ताड़ण, छेदण, त्रायण जैसी कई विधियों से कई उपाय करके देख लिए किन्तु जैसे नमक का पानी बिना संयोग नहीं हो सकता

और सोने को बिना तपाए कलंक रहित नहीं किया जा सकता ठीक उसी प्रकार जीव आपके नामोपसना के बिना उबर

सकता।

अतः रैदास यह अनुरोध करते हैं कि इस कठिन माया रूपी कलियुग में कुछ उपाय अवश्य करिए क्योंकि इस माया रूपी

भवजाल में साधक दिन-प्रतिदिन फँसकर न केवल डूबता जा रहा है बल्कि खासा भयभीत भी है इसीलिए हे प्रभु! उसके

मुक्ति रूपी निदान के लिए हाथ बढ़ाकर उसकी मदद करिए क्योंकि इस दारुण दशा में उसे केवल आप का अवलंबन है।

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