Raidas ke Pad – रैदास/रबिदास के पद – राम जन हूँ उंन भगत कहाऊँ, सेवा करौं न दासा

राम जन हूँ उंन भगत कहाऊँ, सेवा करौं न दासा….

राम जन हूँ उंन भगत कहाऊँ, सेवा करौं न

दासा।

गुनी जोग जग्य कछू न जांनूं , ताथैं रहूँ

उदासा।। टेक।।

भगत हूँ वाँ तौ चढ़ै बड़ाई। जोग करौं जग

मांनैं।

गुणी हूँ वांथैं गुणीं जन कहैं, गुणी आप कूँ

जांनैं।। 1।।

ना मैं ममिता मोह न महियाँ, ए सब जांहि

बिलाई।

दोजग भिस्त दोऊ समि करि जांनूं, दहु वां थैं

तरक है भाई।। 2।।

मै तैं ममिता देखि सकल जग, मैं तैं मूल

गँवाई।

जब मन ममिता एक एक मन, तब हीं एक है

भाई।। 3।।

कश्न करीम रांम हरि राधौ, जब लग एक

एक नहीं पेख्या।

बेद कतेब कुरांन पुरांननि, सहजि एक नहीं

देख्या।। 4।।

जोई जोई करि पूजिये, सोई सोई काची

सहजि भाव सति होई।

कहै रैदास मैं ताही कूँ पूजाैं, जाकै गाँव न

ठाँव न नांम नहीं कोई।। 5।।

संदर्भ –

प्रस्तुत पद्यांश भक्तिकालीन निर्गुण काव्यधारा के ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख संत कवि रैदास द्वारा रचित है। अन्य पदों की

भांति इस पद का संकलन भी ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में किया गया है।

व्याख्या –

मैं तो राम जन हूँ उसी निर्गुण राम के भक्त के रूप में प्रसिद्ध हूँ लेकिन सगुणों की भांति दास्य भक्ति नहीं करता। गुण, योग,

यज्ञ जैसे विधि-विधान मैं नहीं जानता इसीलिए उस मार्ग से अलग मैं निराकार ब्रह्म का निर्गुण उपासक हूँ।

भगत जो कि नाना प्रकार के चढ़ावे चढ़ाता है और योगी तरह-तरह के योग दिखाता है। जिनके प्रदर्शन से प्रभावित होकर

लोग इनका भांति-भांति से गुणगान करते हैं। साकार ईश्वर पर भरोसा करते हैं इसी कारण लोग उन्हें सगुण कहते हैं। और वे

अपने को गुणीं मां लेते हैं । जबकि वास्तविकता कुछ और है।

मैं मोह, माया, प्रदर्शन जैसे नश्वर चीजों में विश्वास नहीं रखता मुझे भरोसा केवल प्रेम से है। जो दो धर्मों की खाईं को पाटकर

एक समान कर सकता है।

जब तक अपने अंधकार से ममता है तब तक दोनों अपना सर्वस्व गँवाते रहेंगे किन्तु जैसे ही यह एक दूसरे के प्रति होगी दोनों

परस्पर भाई हो जाएंगे।

कृष्ण, रहीम, राम, हरि, राधा आदि सभी को जब तक साधना में एक रूप के तौर पर नहीं देखा तब तक वेद, पुराण, कितेब,

कुरान सभी कुछ पढ़ना व्यर्थ है क्योंकि उस ज्ञान से सहजता का विकास साधक में हुआ ही नहीं।

दर-दर उपासना करके देख लिया सब कच्चा ही निकला यानि गुमराह ही हुआ। वास्तविक सत्य तो इनसे ऊपर उठकर

सहज हो जाना है। इसलिए अब रैदास उसकी उपासना करेंगे जिसका नाम, गाँव, स्थान कुछ नहीं होगा अर्थात अब वे

अगोचर निराकर ब्रह्म के उपासक हो गए हैं। जहाँ किसी भी प्रकार का विभेद नहीं है।

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