Hindi Gadyansh – गद्यांश या अवतरण – 1

निर्देशः निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उससे सम्बन्धित प्रश्नों (प्रश्न-संख्या 1 से 5) के उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए:

सौन्दर्य किसे कहते हैं? प्रकृति, मानव-जीवन तथा ललित कलाओं के आनन्ददायक गुण का नाम सौन्दर्य है। इस स्थापना पर आपत्ति यह की जाती है कि कला में कुरूप और असुन्दर को भी स्थान मिलता है; दुःखान्त नाटक देखकर हमें वास्तव में दुःख होता है; साहित्य में वीभत्स का भी चित्रण होता है; उसे सुन्दर कैसे कहा जा सकता है ? इस आपत्ति का उत्तर यह है कि कला में कुरूप और असुन्दर विवादी स्वरों के समान हैं जो राग के रूप को निखारते हैं। वीभत्स का चित्रण देखकर हम उससे प्रेम नहीं करने लगते; हम उस कला से प्रेम करते हैं जो हमें वीभत्स से घृणा करना सिखाती है। वीभत्स से घृणा करना सुन्दर कार्य है असुन्दर? जिसे हम कुरूप, असुन्दर और वीभत्स कहते हैं, कला मे उसकी परिणति सौन्दर्य में होती है। दुःखान्त नाटकों में हम दूसरों का दुःख देखकर द्रवित होते हैं। हमारी सहानुभूति अपने तक, अथवा परिवार और मित्रों तक सीमित न रहकर एक व्यापक रूप ले लेती है। मानव-करूणा के इस प्रसार को हम सुन्दर कहेंगे या असुन्दर? सहानुभूति की इस व्यापकता से हमें प्रसन्न होना चाहिए या अप्रसन्न? दुःखान्त नाटकों अथवा करूणा रस के साहित्य से हमें दुःख की अनुभूति होती है किन्तु यह दुःख अमिश्रित और निरपेक्ष नहीं होता। उस दुःख में वह आनन्द निहित होता है जो करुणा के प्रसार से हमें प्राप्त होता है। इसके सिवा इस तरह के साहित्य में हम बहुधा मनुष्य को विषम परिस्थितियों से वीरता पूर्ण संघर्ष करते हुए पाते हैं। संघर्ष का यह उदात्त भाव दुःख की अनुभूति को सीमित कर देता है। वीर मनुष्यों का यह संघर्ष हमें अपनी परिस्थितियों के प्रति सजग करता है, उनकी पराजय भी प्रबुद्ध दर्शकों तथा पाठकों के लिए चुनौती का काम करती है। उनकी वेदना हमारे लिए प्रेरणा बन जाती है। आनन्द को इस व्यापाक रूप में लें, उसे इन्द्रियजन्य सुख का पर्यायवाची ही न मान लें, तो हमें करुणा और वीभत्स के चित्रण में सौन्दर्य के अभाव की प्रतीति न होगी।

96. साहित्य में वीभत्स का भी चित्रण सुन्दर होता है, क्योंकि
(1) वीभत्स को ही काव्यशास्त्र में प्रमुख रस माना गया है।
(2) कला में असुन्दर और कुरूप का सौन्दर्य में रूपान्तरण होता है।
(3) कला वीभत्स से घृणा करना नहीं सिखाती
(4) वीभत्स का चित्रण आकर्षक होता है।
उत्तर- (2)/व्याख्या/ जिसे हम कुरूप, असुन्दर और वीभत्स कहते हैं। कला में उसकी परिणति सौन्दर्य होती है। साहित्य में वीभत्स रस का भी चित्रण सुन्दर होता है। क्योंकि कला में असुन्दर और कुरूप का सौन्दर्य में रूपान्तरण होता है।

97. इनमें से कौन-सा कथन सही है?
(1) वीर मनुष्यों की पराजय आनन्द का मूल कारण है।
(2) दुःखान्त नाटकों में सहानुभूति के स्वजनों तक सीमित न रहने से मानव- करुणा का प्रसार होता है।
(3) दुःखान्त नाटक दूसरों के दुःख से जुड़े होने के कारण हमारे दुःख का कारण नहीं बनते।
(4) प्रबुद्ध दर्शक और पाठक दुःख को एक सीमित भाव मानते हैं।
उत्तर- (2)/व्याख्या दःखांत देखकर नाटकों में हम दूसरों का दुःख देखकर द्रवित होते हैं। हमारी सहानुभूति अपने (स्वजनों) तक ही सीमित नही रहती है। यह एक व्यापक रूप ले लेती है। इससे मानव कल्याण का प्रसार होता है।

98. इनमें से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(1) वीर मनुष्यों की वेदना सामाजिक के लिए प्रेरणा बन जाती है।
(2) करुण रस के साहित्य में मनुष्य प्रायः विपरीत स्थितियों में संघर्षरत होता है।
(3) संघर्ष का औदात्य दुःख को सीमित करता है।
(4) दुःख में आनन्द की अनुपस्थिति होती है।
उत्तर- (4)/ व्याख्या /
दुःख में वह आनन्द निहित होता है जो करुणा के प्रसार से हमें प्राप्त होता है। अतः दुःख में आनन्द की अनुपस्थिति नहीं होती है।

99. दुःखान्त नाटकों में सौन्दर्य की उपस्थिति का आधार क्या है?
(1) उनमें कुरूप और असुन्दर को महत्व दिया जाता है।
(2) सभी दुःखान्त नाटक प्रायः महान् होते हैं।
(3) दुःखान्त नाटकों में मानव-करुणा का प्रसार होता है।
(4) दुःखान्त नाटकों में नाटककार स्वानुभूति का चित्रण करता है।
उत्तर- (3)/व्याख्या/ दुःखान्त नाटकों में मानव कल्याण एवं मानव करुणा का प्रसार सौन्दर्य की उपस्थिति का आधार है।

100. करुण रस के साहित्य में आनन्द निहित होता है क्योंकि
(1) आनन्द मात्र इंद्रिय-जन्य सुख है।
(2) साहित्य में करुण रस अपरिहार्य है।
(3) इस साहित्य के मूल में सहानुभूति की व्यापकता है।
(4) साहित्य में दुःख की निरपेक्ष स्थिति है।
उत्तर- (3)/व्याख्या/ करुण रस के साहित्य में आनन्द निहित होता है क्योंकि इस साहित्य के मूल में सहानुभूति की व्यापकता है।

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