एक टोकरी भर मिट्टी – Ek Tokari Bhar Mitti

एक टोकरी भर मिट्टी

(प्रकाशित – 1901, (छत्तीसगढ़ मित्र) पत्रिका में)


किसी श्रीमान् जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उसे झोंपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले, पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थीं; उसका प्रिय प्रति और इकलौता पुत्र भी उसे झोंपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पाँच बरस की कन्या को छोड़कर चल बसी थी। अब यही उसकी पोती वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। जब उसके अपनी पूर्व-स्थिति की आद आ जाती तो दु:ख के फूट-फूट रोने लगती थी। और जब अपने श्रीमान् पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना तब से वह मृतप्राय हो गयी थी। झोंपड़ी में उसका मन लग गया था कि बिना मरे वहाँ से वह निकलना नहीं चाहती थी। श्रीमान् के प्रयत्न निष्फल हुए, तब वे अपने जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्होंने अदालत से झोंपड़ी पर अपना कब्जा करा लिया और विधवा को वहाँ से निकाल दिया। बिचारी अनाथ तो थी ही पास-पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी।

एक दिन श्रीमान् उस झोंपड़ी के आसपास टहल रह थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहाँ बहुँची। श्रीमान् ने उसको देखते ही अपने नौकरों कहा कि इसे यहाँ से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली कि-“महाराज, अब तो यह झोंपड़ी तुम्हारी हो गयी है। मैं उसे लेने नहीं आयी हूँ। महाराज क्षमा करें तो एक विनती है।” जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा कि “जबसे यह झोंपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत कुछ समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल। वहीं रोटी खाऊँगी। अब मैंने ये सोचा कि इस झोंपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊँगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊँ! ‘उ श्रीमान् ने आज्ञा दे दी। विधवा झोंपड़ी के भीतर गयी । वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। अपने आन्तरिक दुःख को किसी तरह सम्हाल कर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आयी। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान् से प्रार्थना करने लगी कि-“महाराज कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइए जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूँ।” जमींदार साब पहले तो बहुत नाराज हुए। पर जब वह बार-बार हाथ जोड़ने लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके मन में कुछ दया आ गयी। किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े। ज्यों ही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा की यह काम उसकी शक्ति के बाहर है। फिर तो उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर। टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्थान पर टोकरी रखी थी, वहाँ से एक हाथ भर ऊँची। न हुई। वह लज्जित होकर कहने लगे कि “नहीं, यह टोकरी हमसे न उठायी जायेगी।

यह सुनकर विधवा ने कहा, “महाराज, नाराज न हों आपसे एक मिट्टी नहीं उठायी जाती और झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी हैं। उसका भार आप जन्म-भर क्योंकर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए।
जमींदार साहब धन–पद से गर्वित हो अपना कर्त्तव्य भूल गये थे पर विधवा के उपरोक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गयीं। कृतकर्म का पश्चात्ताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापिस दे दी।

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