दुलाईवाली की कहानी – Dulai Wali ki Kahani

दुलाईवाली


(प्रकाशित – 1904, (सरस्वती) पत्रिका में)
काशी जी के दशाश्वमेध घाट पर स्नान करके एक मनुष्य बड़ी व्यग्रता के साथ गोदौलिया की तरफ आ रहा था। एक हाथ में एक मैली-सी तौलिया में लपेटी हुई भीगी धोती और दूसरे में सुरती की गोलियों की कई डिबियाँ और सुँघनी की एक पुड़िया थी। उस समय दिन के ग्यारह बजे थे। गोदौलिया की बाईं तरफ जो गली है, उसके भीतर एक और गली में थोड़ी दूर पर, एक टूटे से पुराने मकान में वह जा घुसा। मकान के पहले खण्ड में बहुत अँधेरा था; पर ऊपर की जगह मनुष्य के वासोपयोगी थी। नवागत मनुष्य धड़धड़ाता हुआ ऊपर चढ़ गया। वहाँ एक कोठरी में उसने हाथ की चीजें रख दीं और,“सीता! सीता!” कहकर पुकारने लगा ।
‘क्या है?” कहती हुई एक दस बरस की बालिका आ खड़ी हुई। तब उस पुरुष ने कहा, “सीता! जरा अपनी बहन को बुला ला।”
‘अच्छा” कहकर सीता गई और कुछ देर में एक नवीन स्त्री आकर उपस्थित हुई। उसे देखते ही पुरुष ने कहा-“लो, हमलोगों को तो आज ही जाना होगा।”
इस बात को सुनकर स्त्री कुछ आश्चर्ययुक्त होकर और झुंझला कर बोली-‘आज ही जाना होगा! यह क्यों? भला आज कैसे जाना हो सकेगा? ऐसा ही था तो सवेरे भैया से कह देते। तुम तो जानते हो कि मुँह से कह दिया, बस छुट्टी हुई। लड़की कभी विदा की होती तो मालूम पड़ता। आज तो किसी सूरत जाना नहीं हो सकता।”
“तुम आज कहती हो! हमें तो अभी जाना है। बात यह है कि आज ही नवलकिशोर कलकत्ते से आ रहे हैं। आगरे से भी अपनी नयी बहू को भी साथ ला रहे हैं। सो उन्होंने हमें आज ही जाने के लिए इसरार किया है। हम सब लोग मोगलसराय से साथ ही इलाहाबाद चलेंगे। उनका तार मुझे घर से निकलते ही मिला। इसी से मैं झट नहा-धोकर लौट आया। बस अब करना ही क्या है! कपड़ा-वपड़ा जो कुछ हो बाँध-बूँध कर घण्टे भर में खा-पीकर, चली चलो। जब हम तुम्हे विदा कराने आये ही हैं तब कल के बदले आज ही सही।”
“हाँ, यह बात है! नवल जो चाहें करावें । क्या एक ही गाड़ी में न जाने से दोस्ती में बट्टा लग जाएगा? अब तो किसी तरह रुकोगे नहीं, जरूर ही उनके साथ जाओगे। पर मेरे को नाकों दम आ जायगी।
“क्यों? किस बात से?”
“उनकी हँसी से और किससे! हँसी-ठट्ठा भी राह से अच्छी लगती है। उनकी हँसी मुझे नहीं भाती। एक रोज मैं चौक में बैठी पूड़ियाँ काढ़ रही थी कि इतने में न जाने कहाँ से आकर नवल चिल्लाने लगे, “ए बुआ!” ए बुआ! देखो तुम्हारी बहू पूड़ियाँ खा रही है।” मैं तो मारे सरम के मर गयी। हाँ, भाभी जी ने बात उड़ा दी सही। वे बोली, ‘खाने-पहनने के लिए तो आयी ही है।’ पर मुझे उनकी हँसी बहुत बुरी लगी।”
‘बस इसी से तुम उनके साथ नहीं जाना चाहती? अच्छा चलो, मैं नवल से कह दूँगा कि यह बेचारी कभी रोटी तक तो खाती ही नहीं, पूरी क्यों खाने लगी।”
इतना कहकर वंशीधर कोठरी से बाहर चले आये और बोले, “मैं तुम्हारे भैया के पास जाता हूँ। तुम रो-रुलाकर तैयार हो जाना।’
इतना सुनते ही जानकी देई की आँखें भर आयीं और असाढ़-सावन की ऐसी झड़ी लग गई।
वंशीधर इलाहाबाद के रहने वाले हैं। बनारस में ससुराल है। स्त्री को विदा कराने आये हैं। ससुराल में एक साले, साली और सास के सिवा और कोई नहीं है। नवलकिशोर इनके दूर के नाते में ममेरे भाई हैं। पर दोनों से मित्रता का ख्याल अधिक है। दोनों में गहरी मित्रता है। दोनों एक जान दो कालिब हैं।
उसी दिन वंशीधर का जाना स्थिर हो गया। सीता, बहन के संग जाने के लिए रोने लगी। माँ रोती-धोती लड़की की विदा की सामग्री इकट्ठी करने लगी। जानकी देई भी रोती ही रोती तैयार होने लगी। कोई चीज भूलने पर धीमी आवाज से माँ को याद भी दिलाती गयी। एक बजने पर स्टेशन जाने का समय आया। अब गाड़ी या इक्का लाने कौन जाय? ससुराल वालों की अवस्था अब आगे की-सी नहीं कि दो-चार नौकर-चाकर हर समय बने रहें । सीता के बाप के न रहने से काम बिगड़ गया है। पैसे वाले के यहाँ नौकर-चाकरों के सिवा और भी दो-चार खुशामदी घेरे रहते हैं। छूछे को कौन पूछे? एक कहारिन है; सो भी इस समय कहीं गयी है। सालेराम की तबियत अच्छी नहीं। वे हर घड़ी बिछौने से बाते करते हैं। जिस पर भी आप कहने लगे-“मैं ही धीरे-धीरे जाकर कोई सवारी ले आता हूँ। नजदीक तो है।’
वंशीधर बोले-“नहीं-नहीं, तुम क्यों तकलीफ करोगे? मैं ही जाता हूँ।”
जाते-जाते वंशीधर विचारने लगे कि इक्के की सवारी तो भले घर की स्त्रियों के बैठने लायक नहीं होती। क्योंकि एक तो इतने ऊँचे पर चढ़ना पड़ता है; दूसरे पराये पुरुष के संग एक साथ बैठना पड़ता है। मैं एक पालकी गाड़ी ही कर लूँ ।’ उसमें सब तरह का आराम रहता है। पर जब गाड़ी वालों ने डेढ़ रुपया किराया माँगा, तब वंशीधर ने मन में कहा- “चलो इक्का ही सही। पहुँचने से काम । कुछ नवलकिशोर तो यहाँ से साथ हैं नहीं। इलाहाबाद में देखा जाएगा।”

वंशीधर इक्का ले आये, और जो कुछ असबाब था इक्के पर रखकर आप भी बैठ गये। जानकी देई बड़ी विकलता से रोती हुई इक्के पर जा बैठी। पर इस अस्थिर संसार में स्थिरता कहाँ? यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं।” इक्का जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया वैसे जानकी की रुलाई भी कम होती गयी। सिकरौल के स्टेशन के पास पहुँचते-पहुँचते जानकी अपनी आँखें अच्छी तरह पोंछ चुकी थी।
दोनों चुपचाप चले जा रहे थे कि, अचानक वंशीधर की नज़र अपनी धोती पर पड़ी; और “अरे एक बात तो हम भूल ही गये।” कहकर पछता-से उठे। इक्के वाले के कान बचाकर जानकी ने पूछा, “क्या हुआ? क्या कोई जरूरी चीज भूल आये?”
“नहीं, एक देशी धोती पहिनकर आना था; सो भूलकर विलायती ही पहिन आये। नवल कट्टर स्वदेशी हुए हैं न? वे बंगालियों से भी बढ़ गये हैं। देखेंगे तो दो- चार सुनाये बिना न रहेंगे। और, बात भी ठीक है। नाहक विलायती चीजें मोल लेकर क्यों रुपये की बरबादी की जाय। देशी लेने से भी दाम लगेगा सही; पर रहेगा तो देश ही में ।”
जानकी जी जरा भौंहें टेढ़ी करके बोली, “ऊँह, धोती तो धोती, पहिनने से काम। क्या यह बुरी है ?
इतने में स्टेशन के कुलियों ने आ घेरा। वंशीधर एक कुली करके चले। इतने में इक्के वाले ने कहा, “इधर से टिकट लेते जाइए। पुल के उस पर तो ड्योढ़े दरजे का टिकट मिलता है।”
वंशीधर फिर कर बोले, “अगर में ड्योढ़े दरजे का ही टिकट लूँ तो?” इक्के वाला चुप हो गया। ‘इक्के की सवारी देखकर इसने ऐसा कहा’, यह कहते हुए वंशीधर आगे बढ़ गये। यथा-समय रेल पर बैठकर वंशीधर राजघाट पार करके मुगलसराय पहुँचे। वहाँ पुल लाँघकर दूसरे प्लेटफार्म पर जा बैठे। आप नवल से मिलने की खुशी में प्लेटफार्म के इस छोर से उस छोर तक टहलते रहे। देखते-देखते गाड़ी का धुआँ दिखलाई पड़ा। मुसाफिर अपनी-अपनी गठरी सँभालने लगे। रेल देवी भी अपनी चाल धीमी करती हुई गम्भीरता से आ खड़ी हुई। वंशीधर एक बार चलती गाड़ी ही में शुरू से आखिर तक देख गये। पर नवल का कहीं पता नहीं। वंशीधर फिर सब गाड़ियों को दोहरा गये, तेहरा गये, भीतर घुस-घुस कर एक-एक डिब्बे को देखा किन्तु नवल न मिले। अन्त में आप खिजला उठे, और सोचने लगे कि मुझे तो वैसी चिट्ठी लिखी, और आप न आया। मुझे अच्छा उल्लू बनाया। अच्छा जायेंगे कहाँ? भेंट होने पर समझ लूँगा। सबसे अधिक सोच तो इस बात का था कि जानकी सुनेगी तो ताने पर ताना मारेगी। पर अब सोचने का समय नहीं। रेल की बात ठहरी । वंशीधर झट गये और जानकी को लाकर जनानी गाड़ी में बिठाया। वह पूछने लगी, “नवल की बहू कहाँ है?”
‘वह नहीं आये, कोई अटकाव हो गया” कहकर आप बगल वाले कमरे में जा बैठे। टिकट तो ड्योढ़े का था; पर ड्योढे दरजे का कमरा कलकत्ते से आने वाले मुसाफिरों से भरा था। इसलिए तीसरे दर्जे में बैठना पड़ा। जिस गाड़ी में वंशीधर बैठे थे उसमें सब कमरों में मिलाकर कुल दस-बारह ही स्त्री-पुरुष थे। समय पर गाड़ी छूटी। नवल की बातें, और न-जाने क्या अगड़-बगड़ सोचते गाड़ी कई स्टेशन पार करके मिरजापुर पहुँची।
मिरजापुर में पेटराम की शिकायत शुरू हुई। उसने सुझाया कि इलाहाबाद पहुँचने में अभी देरी है। चलने के झंझट में अच्छी तरह उसकी पूजा किये बिना ही वंशीधर ने बनारस छोड़ा था। इसलिए आप झट प्लेटफार्म पर उतरे, और पानी के बम्बे से हाथ-मुँह धोकर, एक खोंचे वाले से थोड़ी-सी ताजी पूड़ियाँ और मिठाई लेकर, निराले में बैठ आपने उन्हें ठिकाने पहुँचाया। पीछे से जानकी की सुध आयी। सोचा कि पहले पूछ लें, तब कुछ मोल लेंगे। क्योंकि स्त्रियाँ नटखट होती हैं। वे रेल पर खाना पसन्द नहीं करतीं। पूछने पर वहीं बात हुई। तब वंशीधर लौटकर अपने कमरे में जा बैठे। यदि वे चाहते तो इस समय ड्योढ़े में बैठ जाते;क्योंकि अब भीड़ कम हो गयी थी। पर उन्होंने कहा, थोड़ी देर के लिए कौन बखेड़ा करे।
वंशीधर अपने कमरे में बैठे तो एक मुसाफिर अधिक देख पड़े। आगे वालों में से एक उतर भी गया था। जो लोग थे सब तीसरे दर्जे के योग्य जान पड़ते थे; अधिक सभ्य कोई थे तो वंशीधर ही थे। उनके कमरे के पास वाले कमरे में एक भले घर की स्त्री बैठी थी। वह बेचारी सिर से पैर तक ओढ़े, सिर झुकाये, एक हाथ लम्बा घूँघट काढ़े, कपड़े की गठरी-सी बनी बैठी थी। वंशीधर ने सोचा-इनके संग वाले भद्र पुरुष के आने पर उनके साथ बातचीत करके समय बितावेंगे। एक दो करके तीसरी घंटी बजी। तब वह स्त्री कुछ अकचका कर, थोड़ा सा मुँह खोल, जँगले के बाहर देखने लगी। ज्यों ही गाड़ी छूटी, वह मानों काँप-सी उठी। रेल का देना-लेना तो हो ही गया था। अब उसको किसी की क्या परवा? वह अपनी स्वाभाविक गति से चलने लगी। प्लेटफार्म पर भीड़ न थी। केवल दो-चार आदमी रेल की अंतिम विदाई तक खड़े थे। जब तक स्टेशन दिखलाई दिया तब तक वह बेचारी बाहर ही देखती रही। फिर अस्पष्ट स्वर से रोने लगी। उस कमरे में तीन-चार प्रौढ़ा ग्रामीण स्त्रियाँ भी थीं। एक, जो उसके पास ही थी, कहने लगी-‘अरे इनका मनई तो नाहीं अईलेन । हो देख हो रोवल करथईन।”

दूसरी-“अरे दुसर गाड़ी में बैठा होंइहें।”
पहली-“दूर बौरही! ई जनानी गाड़ी थोड़े है।”
दूसरी-“तऊ हो भल्तो तो कहू।” कहकर दूसरी भद्र महिला ने पूछने लगी,“कौन-गाँव उतरबु बेटा! मीरजैपूरा चढ़ो हऊ न?” इसके जवाब में उसने जो कहा सो वह न सुन सकी।
तब पहली बार बोली-“हट हम पुँछिला न, हम कहा काहाँ ऊतरबू हो?
“आँय ईलाहाबास?”
दूसरी-“ईलाहाबास कौन गाँव हौ गोईयाँ?”
पहली-“अरे नाहीं जनलूं? पैयाग जी, जहाँ मनई मकर नाहाए जाला।”
दूसरी-“भला पैयाग जी काहे न जानीथ; ले कहैके नाहीं, तोहरे पच के धरम से चार दाँई नहाए चुकी हँई। ऐसों हो सोमवारी, अउर गहन, दका, दका, लाग रहा तउन तोहरे काशी जी नाँहाय गइ रहे।”
पहली-“आवै जाय के तो सब अऊते जाता बटले बाटेन। फुन यह साइत तो बिचारो विपत में न पड़ल बाटिली। हे हम पंचा हइ; राजघाट टिकस कटऊली; मोंगल के सरायँ उतरलीह; होद पुनं; चढ़लीह”।
दूसरी-“ऐसे एक दाँई हम आवत रहे। एक मिली औरो मोरे संघे रही। द कौने टिसनीया पर उकर मलिकवा उतरे से कि जुरतँइहैं गड़िया खुली। अब भईया उ: गरा फाड़ फाड़ नरियाय, ए साहब गड़िया खड़ी कर। एक साहेब गड़ियां तँनी खड़ी कर। भला गड़िया दहिनाती काहै के खड़ी होय?”
पहली-“उ मेहररूवा बड़ी उजवक रहल। भला केहू के चिल्लाये से रेलीऔ कहूँ खड़ी होला?” इसकी इस बात पर कुल कमरे वाले हँस है। अब जितने पुरुष-स्त्रियाँ थीं, एक से एक अनोखी बातें कहकर अपने-अपने तजरुबे बयान करने लगीं। बीच-बीच में उस अकेली अबला की स्थिति पर भी दुःख प्रकट करती जाती थीं।
तीसरी स्त्री बोली-“टीक्कसिया पल्ले बाय द नाँही। सहेबवा सुनि तो कलकत्ते ताँइ ले मसुलिया लेई । अरे-इहो तो नाँही कि दूर से आवत रहले न, फरागत के बदे उतरलेन ।”
चौथी-“हम तो इनके संग के आदमी के देखबो न किहा गोइयाँ।”
तीसरी-“हम देखे रहली हो, मजेक टोपी दिहले रहलेन को।”
इस तरह उसकी बेसिर-पैर की बाते सुनते-सुनते वंशीधर ऊब उठे। तब से उन स्त्रियों से कहने लगे-“तुम तो नाहक उन्हें और भी डरा रही हो। जरूर इलाहाबाद तार गया होगा और दूसरी गाड़ी से वे भी वहाँ पहुंच जायेंगे। मैं भी इलाहाबाद ही जा रहा हूँ। मेरे संग भी स्त्रियाँ हैं। जो ऐसा ही तो दूसरी गाड़ी के आने तक मैं स्टेशन ही पर ठहरा रहूँगा। तुम लोगों में से यदि कोई प्रयाग उतरे तो थोड़ी देर के लिए स्टेशन पर ठहर जाना। इनको अकेला छोड़ देना उचित नहीं। यदि पता मालूम हो जायेगा तो मैं इन्हें इनके ठहरने के स्थान पर भी पहुँचा दूँगा।”
वंशीधर की इन बातों से उन स्त्रियों की वाक्-धारा दूसरी ओर बह चली, “हाँ यह बात तो आप भली कही।” “नाहीं भइया! हम पंचे काहिके केहुसे कुछ कहीं। अरे एक से एक करत न बाय तो दुनिया चलत कैसे बाय?” इत्यादि ज्ञान-गाथा होने लगी। कोई-कोई तो उस बेचारी को सहारा मिलते देख खुश हुए और कोई-कोई नाराज भी हुए। क्यों, सो में नहीं बतला सकता। उस गाड़ी में जितने मनुष्य थे सभी ने इस विषय में कुछ-न-कुछ कह डाला था। पिछले कमरे में केवल एक स्त्री जो फरासीसी छींट की दुलाई ओढ़ अकेली बैठी थी, कुछ नहीं बोली। कभी-कभी घूँघट के भीतर से एक आँख निकालकर वंशीधर की ओर वह ताक देती थी और, सामना हो जाने पर, फिर मुँह फेर लेती थी। वंशीधर सोचने लगे कि “यह क्या बात है? देखने में तो यह भले घर की मालूम होती है, पर आचरण इसका अच्छा नहीं।”
गाड़ी इलाहाबाद के पास पहुँचने को हुई। वंशीधर उस स्त्री को धीरज दिलाकर आकाश-पाताल सोचने लगे। यदि तार में कोई खबर न आई होगी तो दूसरी गाड़ी तक स्टेशन पर ही ठहरना पड़ेगा और जो उससे भी कोई न आया तो क्या करूँगा? जो हो गाड़ी नैनी से छूट गयी। अब साथ की उन अशिक्षिता स्त्रियों ने फिर मुँह खोला । “क भईया, जो केहु बिन टिक्कस के आवत होय तो ओकर का सजाय होला? अरे ओंका ई नाहीं चाहत रहा कि मेहतारू के तो बैठा दिहलेन, अउर अपुआ तउन टिक्कस लेई के चल दिहलेन।” किसी-किसी आदमी ने तो यहाँ तक दौड़ मारी कि रात को वंशीधर इसके जेवर छीन कर रफूचक्कर हो जायेंगे। उस गाड़ी में एक लाठी वाला भी था, खुल्लमखुल्ला कहा-“का बाबू जी! कुछ हमरो साझ?”
इसकी बात पर वंशीधर क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने उसे खूब धमकाया। उस समय तो वह चुप हो गया, पर यदि इलाहाबाद उतरता तो वंशीधर से बदला लिये बिना न रहता।
वंशीधर इलाहाबाद में उतरे। एक बुढ़िया को भी वहीं उतरना था। उससे उन्होंने कहा कि “उनको भी अपने संग उतार लो।” फिर उस बुढ़िया को उस स्त्री के पास बिठाकर आप जानकी को उतारने लगे। जानकी ये सब हाल कहने पर वह बोली-“अरे जाने भी दो; किस बखेड़े में पड़े हो।” पर वंशीधर ने न माना। जानकी को और उस भद्र महिला को एक ठिकाने बिठाकर आप स्टेशन मास्टर के पास गये। वंशीधर के जाते ही वह बुढ़िया, जिसे उन्होंने रखवाली के लिए छोड़ा था, किसी बहाने से भाग गई। स्टेशन मास्टर से पूछने पर मालूम हुआ कि कोई तार नहीं आया। अब तो वंशीधर बड़े असमंजस में पड़े। टिकट के लिए बखेड़ा होगा। क्योंकि वह स्त्री बे-टिकट है। लौटकर आये तो किसी को न पाया। “अरे ये सब कहाँ गई?” यह कहकर चारों तरफ देखने लगे। कहीं पता नहीं। इस पर वंशीधर घबराये, “आज कैसी बुरी साइत में घर से निकले कि एक के बाद दूसरी आफ़त में फँसते चले जा रहे हैं।” इतने में अपने सामने उस दुलाई वाली को आते देखा, “तू ही उन स्त्रियों को कहीं ले गई है’, इतना कहना था कि दुलाई से मुँह खोलकर नवल किशोर खिलखिला उठे।
“अरे यह क्या? यह तुम्हारी ही करतूत है। अब मैं समझ गया। कैसा गजब तुमने किया है? ऐसी हँसी मुझे नहीं अच्छी लगती। मालूम होता है यह तुम्हारी ही बहू थी। अच्छा तो वे गई कहाँ?”
“वे लोग तो पालकी गाड़ी में बैठी हैं। तुम भी चलो।”
“नहीं, मैं सब हाल सुन लूँगा तब चलूँगा। हाँ, यह तो कहो, तुम मिरजापुर में कहाँ से आ निकले।”
“मिरजापुर नहीं, मैं तो कलकत्ते से, बल्कि मुगलसराय से, तुम्हारे साथ चला आ रहा हूँ। तुम जब मुगलसराय में मेरे लिए चक्कर लगाते थे तब मैं ड्योढ़े दर्जे में ऊपर वाले बेंच पर लेटे तुम्हारा तमाशा देख रहा था। फिर मिरजापुर में जब तुम पेट के धन्धे में लगे थे, मैं तुम्हारे पास से निकल गया पर तुमने न देखा। मैं तुम्हारी गाड़ी में जा बैठा। सोचा कि तुम्हारे आने पर प्रकट होऊंगा। फिर थोड़ा और देख लें, करते-करते यहाँ तक नौबत पहुँची। अच्छा अब चलो, जो हुआ उसे माफ करो।”
यह सुन वंशीधर प्रसन्न हो गये। दोनों मित्रों में बड़े प्रेम से बातचीत होने लगी। वंशीधर बोले-“मेरे ऊपर तो कुछ बीती सो बीती, पर वह बेचारी जो तुम्हारे-से गुनवान के संग पहली बार रेल में आ रही थी, बहुत ही तंग हुई। उसे तो तुमने नाहक रुलाया। बहुत ही डर गयी थी ।’
“नहीं जी! डर किस बात का था? हम-तुम, दोनों गाड़ी में न थे?”
“हाँ पर, यदि मैं स्टेशन मास्टर से इत्तिला कर देता तो बखेड़ा खड़ा हो जाता न?”
”अरे तो क्या, मैं मर थोड़े ही गया था। चार हाथ की दुलाई की बिसात ही कितनी? ”
इसी तरह बातचीत करते-करते दोनों गाड़ी के पास आये। देखा तो दोनों मित्र- बंधुओं में खूब हँसी हो रही है। जानकी कह रही थी-“अरे तुम जानों क्या, इन लोगों की हँसी ऐसी ही होती है। हँसी में किसी के प्राण भी निकल जायँ तो भी इन्हें दया न आवे ।’
खैर, दोनों मित्र अपनी-अपनी घरवाली को लेकर राजी-खुशी घर पहुँचे और मुझे भी उनकी यह राम-कहानी लिखने से छुट्टी मिली।

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