Chandra Gupta Maurya Natak – चंद्रगुप्त मौर्य नाटक

Chandra Gupta Maurya Natak – चंद्रगुप्त मौर्य नाटक चंद्रगुप्त नाटक का सारांश। चंद्रगुप्त नाटक का सार यहाँ से पढ़ सकते हैं।

यह ऐतिहासिक नाटक यूनानी या सिकंदरी आक्रमण से भारत की रक्षा के संबंध में चाणक्य के नीति-कौशल को चित्रित करता है। इसमें भारतीय संस्कृति और गौरवशाली अतीत की महान परंपरा का परिचय दिया गया है |

तक्षशिला के आचार्य चाणक्य गुरुकुल दीक्षान्त समारोह के अवसर पर अपने शिष्यों को भारतीय राजनीति और विदेशी आक्रमण की सम्भावना से अवगत कराते हैं। इसी अवसर पर गांधार के युवराज आम्भीक का चन्द्रगुप्त और सिंहरण नामक छात्रों से विवाद हो जाता है। आम्भीक की बहन अलका मालव कुमार सिंहरण की तेजस्विता पर मुग्ध होकर भाई से कलह मिटाने का आग्रह करती है | चन्द्रगुप्त और सिंहरण देश की रक्षा के लिए सर्वस्व समर्पण का संकल्प लेते हैं । चाणक्य और चन्द्रगुप्त अपनी जन्मभूमि पाटलिपुत्र में लौटकर नंद की विलासिता का दुष्परिणाम देख और अपने माता-पिता का दु:खद समाचार सुनकर राष्ट्रोद्धार का दृढ़ संकल्प लेते हैं । सरस्वती मंदिर के उपवन में रंगोत्सव का आयोजन देखने नंद कुमारी कल्याणी सखियों के साथ आती है । इसी समय राजा का शिकारी चीता पिंजरे से निकलकर कल्याणी की ओर झपटता है । चन्द्रगुप्त अपने तीर से उसका सिर भेदकर कल्याणी की रक्षा करता है | कल्याणी और चन्द्रगुप्त में वार्तालाप होता है । इधर चाणक्य नंद की राजसभा में प्रविष्ट होकर आर्यावर्त की स्थिति समझाते हुए कहता है- “यवनों की विकट वाहिनी निषध-पर्वत माला तक पहुँच गई है । तक्षशिलाधीश की भी उसमें अभिसंधि है । सम्भवतः समस्त आर्यावर्त पदाक्रांत होगा | उत्तरापथ में बहुत छोटे-छोटे गणराज्य हैं, वे उस सम्मिलित पारसी सह यवन बल को रोकने में असमर्थ होंगें | अकेले पर्वतेश्वर ने साहस किया है, इसलिए मगध को पर्वतेश्वर की सहायता करनी चाहिए ।” राजसभा में कल्याणी और चन्द्रगुप्त पहुँच जाते हैं । नंद की आज्ञा से प्रतिहार चाणक्य की शिखा पकड़कर उसे घसीटता हुआ बाहर निकाल देता है । चाणक्य प्रतिज्ञा करता है – “यह शिखा नंद कुल की काल सर्पिणी है, वह तब तक न बंधन में होगी जब तक नंद कुल निःशेष न होगा ।”

कुछ दिन बीतने पर राक्षस बंदी चाणक्य से तक्षशिला में मगध का गुप्त प्रतिनिधि बनने का आग्रह करता है। उसे अस्वीकार करने पर वररुचि अपने साथ पाणिनि का भाष्य लिखने को बाध्य करता है तो चाणक्य कहता है — “भाषा ठीक करने से पहले मैं मनुष्यों को ठीक करना चाहता हूँ ।” राक्षस क्रुद्ध होकर उसे अंधकूप में बंदी बनाने का दंड देता है । उसी समय खून से सनी खड्ग लिये अचानक चन्द्रगुप्त का प्रवेश होता है और अपने शस्त्र बल की कुशलता से गुरुदेव को मुक्त कराता है। चाणक्य मगध से पंचनद पर्वतेश्वर की राजसभा में पहुँचता है । वह मगध राज्य पर चन्द्रगुप्त का अधिकार स्थापित करने के उद्देश्य से पर्वतेश्वर से सैन्य सहायता माँगता है पर पंचनद-नरेश सिकंदर के सामने युद्ध की आशंका और चन्द्रगुप्त के वृषलत्व/अभिजात्य कुलीनता से हीन होने के कारण चाणक्य का प्रस्ताव ठुकरा देता है । असफल होकर चाणक्य और चन्द्रगुप्त भटकते-भटकते सिन्धु तट के समीप सिल्यूकस के शिविर मे पहुँचते हैं । मार्ग में सिल्यूकस मूर्छित चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने वाले व्याघ्र को मारकर उस की रक्षा करता है । अपने राज्य में चाणक्य और चन्द्रगुप्त को शत्रु शिविर में देखकर गांधार कन्या अलका विस्मित होती है । यवन सैनिकों से अलका इससे पूर्व अपमानित हो चुकी है । अतः उसके मन में बड़ा विक्षोभ होता है । सभी अपनी-अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सिन्धु तट पर दांड्यायन के आश्रम में एकत्र होते है । सिकन्दर के साथ सिल्यूकस कार्नेलिया के साथ पहुँचता है । अलका अपने मन का संशय और विक्षोभ प्रकट करती है । चाणक्य उसकी शंका को निर्मूल करता है । सिकंदर अपनी विजय का आशीर्वाद मांगता है | दांड्यायन उसे समझाते हुए कहता है — “विजय तृष्णा का अंत पराभव में होता है, अलक्षेन्द्र | राजसत्ता सुव्यवस्था से बढ़े तो बढ़ सकती है, केवल विजयों से नहीं । इसलिए अपनी प्रजा के कल्याण में लगो ।” – सिकन्दर की उत्कंठा मिटाते हुए दांड्यायन चन्द्रगुप्त की ओर सकेत करते हुए यह भी कहते हैं — “अलक्षेन्द्र, सावधान । देखो यह भारत का भावी सम्राट तुम्हारे सामने बैठा है ।” — यहीं प्रथम अंक समाप्त होता है।

सिकन्दर का निमन्त्रण पाकर चन्द्रगुप्त यवन – शिविर में ग्रीक युद्धनीति सीखता है और एक दिन सिल्यूकस कन्या की रक्षा फिलिप्स नामक विलासी ग्रीक योद्धा से करता है । कार्नेलिया भारत के भावी सम्राट चन्द्रगुप्त की विनयशील वीरता पर मुग्ध होकर इस घटना से पिता को अवगत कराने के लिए चन्द्रगुप्त से निवेदन करती है ।सिकंदर अपने सैन्यबल में चन्द्रगुप्त को मगध का सम्राट बनाने की योजना सामने रखता है । जिसे चन्द्रगुप्त अस्वीकार करता है | सिकंदर रुष्ट होकर उसे बंदी बनाना चाहता है किन्तु वह आम्भीक, फिलिप्स और एनिसाक्रिटीज को आहत करता हुआ निकल जाता है। ।

अब चन्द्रगुप्त, सिंहरण और अलका सपेरा, नट-नटी का वेश बदलकर पर्वतेश्वर के युद्ध – शिविर मे पहुँचते हैं और पंचनद नरेश को यवन रणनीति से सावधान रहकर रणव्यूह-रचना का परामर्श देते हैं । पर्वतेश्वर के चले जाने पर अलका सिंहरण को अपने शिविर मे आमंत्रित करती है | चन्द्रगुप्त सिंहरण को पृथककर एकान्त में कल्याणी से युद्ध का भविष्य बताता है। दोनों वास्तविक स्थिति समझकर अपने-अपने कार्य में लग जाते हैं । सिकन्दर युद्ध की भेरी बजाता है। पर्वतेश्वर और सिल्यूकस में घोर युद्ध होता है । ग्रीक सेनापति आहत हो जाता है । विकट यवन वाहिनी को आते देख सिंहरण पर्वतेश्वर से सुरक्षित पहाड़ी पर चले जाने का आग्रह करता है पर वह युद्धक्षेत्र से नहीं हटता | दोनो वीरतापूर्वक यवन योद्धाओं से युद्ध करते हैं पर लड़खड़ाकर गिरने लगते हैं तो सिकंदर युद्ध बन्द करने की आज्ञा देता है । चन्द्रगुप्त सिकन्दर को ललकारता है पर सिकंदर पर्वतेश्वर के शौर्य पर मुग्ध होकर कहता है – “भारतीय वीर पर्वतेश्वर। अब मैं तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करूँ ?” पर्वतेश्वर रक्त पोंछते हुए कहता है— “जैसा एक नरपति अन्य नरपति के साथ करता है।” दोनो में मैत्री हो जाती है | कल्याणी अपना शिरस्त्राण फेंककर पर्वतेश्वर को लज्जित करते हुए कहती है — “जाती हूँ क्षत्रिय पर्वतेश्वर | तुम्हारे पतन में रक्षा न कर सकी, बड़ी निराशा हुई ।” अलका घायल सिंहरण को उठाना चाहती है । आम्भीक दोनो को बंदी बनाता है ।

अब सिकन्दर मालवा पर आक्रमण करता है । पर्वतेश्वर अलका से विवाह का प्रस्ताव करता है किन्तु वह प्रतिबन्ध लगाती है कि मालव युद्ध में आपको सिकन्दर की सहायता नहीं करनी होगी । पर्वतेश्वर पहले तो वचनबद्ध होता है किन्तु सैन्यदल के साथ सिकंदर की सहायता को प्रस्थान करता है | अलका मालविका आदि के उद्योग और चन्द्र गुप्त के सेनापतित्व में गणराज्यों की सम्मिलित सैन्य शक्ति से सिकन्दर पराजित और आहत होता है । यहीं द्वितीय अंक समाप्त होता है ।

इस विजय के उपरान्त सिंहरण और अलका का विवाहोत्सव होता है जिसमें सिकंदर मालवों और यवनों के सम्मिलित उत्सव की घोषणा करता है । यह देखकर अलका का प्रेमी पर्वतेश्वर छुरा से आत्महत्या करना चाहता है किन्तु चाणक्य आकर हाथ पकड़ लेता है | चाणक्य के प्रयास से पर्वतेश्वर और सिंहरण में मैत्री स्थापित होती है। इधर कार्नेलिया और चन्द्रगुप्त में वार्तालाप के समय फिलिप्स पहुँचकर कार्नेलिया को प्रलोभन देता है और चन्द्रगुप्त को द्वन्द्व युद्ध के लिए ललकारता है, किन्तु चन्द्रगुप्त के स्वीकार करने पर प्रस्थान करता है। इधर राक्षस चाणक्य को अपनी मुद्रा देकर सुवासिनी को बंदीगृह से मुक्त कराने का आग्रह करता है | चाणक्य धूमधाम के साथ ससैन्य जलमार्ग से सिकन्दर को उनके देश भेज देता है । यहीं प्रतिमुख सन्धि समाप्त होती है।

तृतीय अंक के प्रारम्भ में सुवासिनी के कारण नंद और राक्षस मे वैमनस्य हो जाता है । नंद एक दिन सुवासिनी को बलपूर्वक पकड़ता है । उसी समय आमात्य राक्षस पहुँच जाता है, और नंद लज्जित होकर कहता है – “यह तुम्हारी अनुरक्ता है राक्षस । मै लज्जित हूँ ।” इधर चाणक्य मालविका, अलका आदि के साथ कुसुमपुर पहुँचकर राक्षस के विवाह के दिन नंद के विरुद्ध प्रजा विद्रोह की योजना बनाता है । शकटार नंद से प्रतिशोध लेने के लिए प्रतिश्रुत होता है । चाणक्य के आदेश से राक्षस की मुद्रा से अंकित एक पत्र मालविका नंद के पास पहुँचाती है जिस मे लिखा है— “सुवासिनी, कारागार से शीघ्र निकल भागो, इस स्त्री के साथ मुझसे आकर मिलो | मैं उत्तरापथ मे नवीन राज्य की स्थापना कर रहा हूँ । नंद से फिर समझ लिया जायगा ।” पत्र पढ़कर नंद राक्षस को बन्दीगृह मे डाल देता है। इस समाचार से नागरिक नंद के विरुद्ध विद्रोह करते हैं । शकटार नंद का वध करता है । प्रजा की सम्मति से चन्द्रगुप्त मगध का शासक नियुक्त होता है। मंत्री-परिषद् की स्थापना होती है | यही तृतीय अंक के साथ गर्भ सन्धि समाप्त होती है |

पर्वतेश्वर कल्याणी से बलात् विवाह करना चाहता हे । वह छुरा निकालकर पर्वतश्वर का वध करती है और उसी से आत्महत्या कर डालती है | चन्द्रगुप्त दक्षिणा पथ को विजय करने के लिए प्रस्थान करता है। उधर राक्षस को संदेह होता है कि शक्तिशाली चाणक्य सुवासिनी से विवाह करना चाहता है । अतः वह मगधराज के विरोध की योजना बनाता है । दक्षिणापथ से विजयी – होकर लौटने पर विजयोत्सव न मनाये जाने से चन्द्रगुप्त के माता-पिता रुष्ट होकर बाहर चले जाते हैं । चन्द्रगुप्त और चाणक्य में इस विषय को लेकर विवाद होता है | चाणक्य राज्य छोड़ देता है । मालविका षड्यंत्रकारियों से चन्द्रगुप्त की रक्षा करते हुए मारी जाती है । सिल्यूकस चन्द्रगुप्त के साथ युद्ध की घोषणा करता है । चन्द्रगुप्त संकल्प-विकल्प करते हुए कहता है – “पिता गये, माता गई, गुरुदेव गये, कंधे से कंधा भिड़ाकर प्राण देनेवाला चिर सहचर सिंहरण गया तो भी चन्द्रगुप्त को रहना पड़ेगा।” यहीं विमर्श सन्धि समाप्त होती है ।

चाणक्य की नीति से आम्भीक और सिंहरण गुप्त रीति से चन्द्रगुप्त की रक्षा करते हैं। मगध सेना के आक्रमण के समय आम्भीक ग्रीक सेना पर टूट पड़ता है और सिल्यूकस से युद्ध करते-करते मारा जाता है यवन सेना को सिंहरण पराजित करता है । सम्राट चन्द्रगुप्त की जयजयकार होती है। सिंहरण से गुरुदेव का प्रयास सुनकर चन्द्रगुप्त अपने को अपराधी स्वीकार करता है । इधर ग्रीक शिविर में पराजय के कारण कार्नेलिया आत्महत्या करना चाहती है। उसी समय चन्द्रगुप्त वहाँ पहुँचकर उसके हाथ से छुरी ले लेता है। कार्नेलिया अपने पिता की हत्या से आशंकित होती है । उसी समय सिल्यूकस आ जाते है । इसी समय सीरिया पर ओटिगोनस के आक्रमण की सूचना मिलती है । मेगस्थनीज सिल्यूकस को चाणक्य की कूट नीति समझाते हुए चन्द्रगुप्त को बन्धु बनाने के लिए कार्नेलिया के साथ उसके विवाह का सुझाव देता है। कार्नेलिया की सहमति से विवाह सम्पन्न होता है | युद्ध में सिल्यूकस का सहायक राक्षस चारों ओर आर्य सैनिकों से घिरने से दांड्यायन के तपोवन में छिप जाता है। राग-द्वेष से मुक्त चाणक्य को देखकर राक्षस, मौर्य और चन्द्रगुप्त अपने अपराधों की क्षमा माँगता है । मौर्य स्वीकार करता है कि “मैं – सबकी अवज्ञा करनेवाले महत्त्वाकांक्षी ब्राह्मण का वध करना चाहता था ।” चन्द्रगुप्त पिता को इस अपराध के लिए प्राणदण्ड देना चाहता है किन्तु चाणाक्य सबके अपराध क्षमा कर देता है। राक्षस अपने अपराधों के लिए दंड माँगता है तो चाणक्य कहते हैं —”आर्य शकटार के भावी जगाता अमात्य राक्षस के लिए, मैं अपना मंत्रित्व छोड़ता हूँ । राक्षस सुवासिनी को सुखी रखना । ”

सिल्यूकस आर्य चाणक्य का अभिनंदन करके स्वदेश लौटना चाहता है । संधिपत्र के साथ सिल्यूकस कार्नेलिया का हाथ चन्द्रगुप्त को पकड़ाता है । जयध्वनि होती है और चाणक्य, मौर्य के साथ अरण्य प्रदेश में प्रस्थान करता है । यहीं निर्वहण संधि के साथ नाटक समाप्त होता है । सन् १९३३ में काशी में मंचन किया गया।

चन्द्रगुप्त का विवाह

चन्द्रगुप्त का विवाह सेल्यूकस निकेटर की पुत्री कार्नेलिया से हुआ था। यह विवाह चन्द्रगुप्त द्वारा युद्ध में सेल्यूकस को 305 ई. पू . में हराने के बाद युद्ध की संधि-शर्तों के साथ हुआ था।

मौर्य वंश के शासक

चंद्रगुप्त ने मौर्य वंश की स्थापना की। उसके बाद इस वंश में बिंदुसार और बिंदुसार के बाद अशोक महान नामक सुप्रसिद्ध शासक हुआ।

चंद्रगुप्त नाटक ?

चंद्रगुप्त नाटक जयशंकर प्रसाद के द्वारा लिखा गया है। चन्द्रगुप्त की रचना 1931 ई. में मानी जाती है यानी यही इसका प्रकाशन काल है। चंद्रगुप्त नाटक में कुल 4 अंक हैं। चंद्रगुप्त नाटक में कुल दृश्यों की संख्या 44 है। चंद्रगुप्त नाटक को ऐतिहासिक नाटक भी कहा जाता है। चंद्रगुप्त नाटक में कुल गीतों की संख्या 13 है। चंद्रगुप्त नाटक का पहली बार मंचन 1933 ई . में काशी में किया गया था। यानी चंद्रगुप्त नाटक को पहली बार 1933 ई. में काशी में खेला गया था।

चंद्रगुप्त नाटक के पात्र?

चंद्रगुप्त नाटक एक ऐतिहासिक नाटक है इसीलिए इसके सभी पात्र भी ऐतिहासिक हैं। चंद्रगुप्त नाटक में कुल 19 पुरुष पात्र एवं 9 स्त्री पात्र हैं। चंद्रगुप्त नाटक के प्रमुख पात्र-

पुरुष पात्र- चंद्रगुप्त, चाणक्य/ विष्णुगुप्त, नंद, अमात्य राक्षस, वररूचि/ कात्यायन, आम्भीक, सिंहरण, पर्वतेश्वर, सिकंदर, सेल्यूकस, एनिसाक्रिटीज, मेगस्थनीज़, शकटार, दांड्यायन आदि।

स्त्री पात्र- अलका, कल्याणी, कार्नेलिया, सुवासिनी, मालविका, मौर्य पत्नी, एलिस आदि।

जयशंकर प्रसाद कौन हैं?

जयशंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य के महान लेखक हैं। जयशंकर प्रसाद छायावाद के रचनाकार हैं। जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 ई. में काशी के गोवर्धनसराय मोहल्ले में हुआ था। जयशंकर प्रसाद के पिता देवीप्रसाद जी थे। जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्धि हिन्दी के एक महान कवि, नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार, निबंध-लेखक के रूप में भी है। जयशंकर प्रसाद को छायावाद का प्रवर्तक भी कहा जाता है।

जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ-

जयशंकर प्रसाद ने कई विधाओं में रचना की है। इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ निम्न हैं-

कविता- प्रेम पथिक, महाराणा का महत्व, चित्राधार, कानन-कुसुम, प्रेम-राज्य, उर्वशी, वन-मिलन, अयोध्या का उद्धार, प्रथम प्रभात, झरना, आँसू, लहर, कामायनी आदि।

कहानी- ग्राम, छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, इंद्रजाल आदि।

उपन्यास- कंकाल, तितली, इरावती आदि।

नाटक- सज्जन, करुणालय, राज्यश्री, विशाख, अजातशत्रु, कामना, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी आदि।

निबंध- काव्य-कला और अन्य निबंध आदि।

चंद्रगुप्त कौन था?

चंद्रगुप्त मौर्य वंश का संस्थापक माना जाता है। चन्द्रगुप्त का जन्म 345 ई. पू . में हुआ था। मुद्राराक्षस ने अपने नाटक ग्रंथ विशाखदत्त में चन्द्रगुप्त को वृषल कहा है, वहीं पश्चिम के विद्वान जस्टिन ने चन्द्रगुप्त को सैंड्रोकोट्स कहा है।

चंद्रगुप्त के गुरु कौन थे?

चंद्रगुप्त के गुरु चाणक्य माने जाते हैं। चाणक्य की मदद से चन्द्रगुप्त ने नंद वंश का पतन करके मौर्य वंश को मगध महाजनपद पर स्थापित किया।

चाणक्य कौन थे?

चाणक्य सुप्रसिद्ध तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य थे। इनका समय 376 ई. पू .- 283 ई. पू . के आस-पास माना जाता है। चणक का पुत्र होने के कारण इनका नाम चाणक्य पड़ा। चाणक्य के अन्य नाम कौटिल्य और विष्णुगुप्त माने जाते हैं। चाणक्य ने अर्थशास्त्र नामक महान ग्रंथ लिखा है जिसे राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति का महान ग्रंथ भी कहा जाता है। इसके साथ ही चाणक्य सेल्यूकस निकेटर के गुरु और कुछ समय के लिए उनके महामंत्री भी रहे थे।

सिकंदर कौन था?

सिकंदर यूनान का महान योद्धा और विश्व-विजयी शासक माना जाता है। उसका जन्म 356 ई. पू . यूनान के एक सुप्रसिद्ध शहर मकदूनिया में हुआ था। सिकंदर के पिता का नाम फ़िलिप था। सिकंदर अरस्तू का शिष्य था। सिकंदर को अलेक्ज़ेंडर भी कहा जाता है। सिकंदर का सेनापति सेल्यूकस था। सिकंदर ने भारत विजय अभियान की योजना 326 ई. पू . में शुरू की थी। सिकंदर भारत 325 ई. पू . में आया था। सिकंदर का युद्ध पंजाब के राजा पोरस के साथ हुआ था।

मेगस्थनीज कौन था?

मेगस्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था। मेगस्थनीज एक ग्रीक यात्री के रूप में जाना जाता है। मेगस्थनीज सेल्यूकस के बाद चन्द्रगुप्त के दरबार में रहा करता था। मेगस्थनीज ने इंडिका नामक सुप्रसिद्ध पुस्तक लिखी है।

सेल्यूकस कौन था?

सेल्यूकस का पूरा नाम सेल्यूकस निकेटर था। यह एक ग्रीक योद्धा था। सेल्यूकस सिकंदर की सेना का सेनापति भी था। सिकंदर के भारत से वापस लौट जाने पर सेल्यूकस निकेटर ही उसके द्वारा जीते हुए क्षेत्रों को सम्भाला करता था।

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