अपना अपना भाग्य – Apna Apna Bhagya

अपना अपना भाग्य
(प्रकाशित – 1931 ई., वातायन कहानी संग्रह में)


बहुत कुछ निरुद्देश्य घूम चुकने पर हम सड़क के किनारे की एक बेंच पर बैठ गए। नैनीताल की संध्या धीरे-धीरे उतर रही थी। रुई के रेशे-से भाप-से बादल हमारे सिरों को छू-छूकर बेरोक-टोक घूम रहे थे। हल्के प्रकाश और अंधियारी से रंगकर कभी वे नीले दीखते, कभी सफेद और फिर देर में अरुण पड़ जाते। वे जैसे हमारे साथ खेलना चाह रहे थे।
पीछे हमारे पोलो वाला मैदान फैला था। सामने अंग्रेजों का एक प्रमोदगृह था, जहाँ सुहावना, रसीला बाजा बज रहा था और पार्श्व में था वहीं सुरम्य अनुपम नैनीताल।
ताल में किश्तियाँ अपने सफेद पाल उड़ाती हुई एक-दो अंग्रेज यात्रियों को लेकर, इधर से उधर और उधर से इधर खेल रही थीं। और कहीं कुछ अंग्रेज एक-एक देवी सामने प्रतिस्थापित कर, अपनी सुई-सी शक्ल की डॉगियों को, मानो शर्त बाँधकर सरपट दौड़ा रहे थे। कहीं किनारे पर कुछ साहब अपनी बंसी डाले, सधैर्य, एकाग्र, एकस्थ, एकनिष्ठ मछली-चिन्तन कर रहे थे।
पीछे पोलो-लान में बच्चे किलकारियाँ मारते हुए हॉकी खेल रहे थे। शोर, मार- पीट, गाली-गलौच भी जैसे खेल का ही अंश था। इस तमाम खेल को उतने क्षणों का उद्देश्य बना, वे बालक अपना सारा मन, सारी देह, समग्र बल और समूची विद्या लगाकर मानो खत्म कर देना चाहते थे। उन्हें आगे की चिन्ता न थी, बीते का ख्याल न था। वे शुद्ध तत्काल के प्राणी थे। वे शब्द की सम्पूर्ण सच्चाई के साथ जीवित थे।
सड़क पर से नर-नारियों का अविरल प्रवाह आ रहा था और जा रहा था। उसका न ओर था न छोर। यह प्रवाह कहाँ जा रहा था, और कहाँ से आ रहा था, कौन बता सकता है? सब उम्र के, सब तरह के लोग उसमें थे। मानो मनुष्यता के नमूनों का बाजार सजकर सामने से इठलाता निकला चला जा रहा हो।
अधिकार-गर्व में तने अंग्रेज उसमें थे और चिथड़ों से सजे घोड़ों की बाग थामे वे पहाड़ी उसमें थे, जिन्होंने अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान को कुचलकर शून्य बना लिया है और जो बड़ी तत्परता से दुम हिलाना सीख गए हैं।
भागते, खेलते, हँसते, शरारत करते लाल-लाल अंग्रेज बच्चे थे और पीली- पीली आँखें फाड़े, पिता की उंगली पकड़कर चलते हुए अपने हिन्दुस्तानी नौनिहाल भी थे।
अंग्रेज पिता थे, जो अपने बच्चों के साथ भाग रहे थे, हँस रहे थे और खेल रहे थे। उधर भारतीय पितृदेव भी थे, जो बुजुर्गों को अपने चारों तरफ लपेटे धन-संपन्नता के लक्षणों का प्रर्दशन करते हुए चल रहे थे।
अंग्रेज रमणियाँ थीं, जो धीरे-धीरे नहीं चलती थीं, तेज चलती थीं। उन्हें न चलने में थकावट आती थी, न हँसने में मौत आती थी। कसरत के नाम पर घोड़े पर भी बैठ सकती थीं और घोड़े के साथ ही साथ, जरा जी होते ही, किसी-किसी हिन्दुस्तानी घर कोड़े भी फटकार सकती थीं। वे दो-दो, तीन-तीन, चार-चार की टोलियों में, निःशंक निरापद इस प्रवाह में मानो अपने स्थान को जानती हुई, सड़क पर चली जा रही थीं।
उधर हमारी भारत की कुललक्ष्मी, सड़क के बिल्कुल किनारे दामन बचाती और सँभालती हुई, साड़ी की कई तहों में सिमट-सिमटकर, लोक-लाज, स्त्रीत्व और भारतीय गरिमा के आदर्श को अपने परिवेष्टनों में छिपाकर सहमी-सहमी धरती में आँख गाड़े, कदम-कदम बढ़ रही थीं।
इसके साथ ही भारतीयता का एक और नमूना था। अपने कालेपन को थे, खरच – खुरचकर बहा देने की इच्छा करनेवाला अंग्रेजीदाँ पुरुषोत्तम जो नेटिव को देखकर मुँह फेर लेते थे और अंग्रेज को देखकर आँखें बिछा देते थे और दुम हिलाने लगते थे। वैसे वे अकड़कर चलते थे-मानो भारतभूमि को इसी अकड़ के साथ कुचल-कुचलकर चलने का उन्हें अधिकार मिला है।
घण्टे के घण्टे सरक गए। अँधकार गाढ़ा हो गया। बादल सफेद होकर जम गए। मनुष्यों का वह तांता एक-एक कर क्षीण हो गया। अब इक्का-दुक्का आदमी सड़क पर छतरी लगाकर निकल रहा था। हम वहीं के वहीं बैठे थे। सर्दी-सी मालूम हुई। हमारे ओवरकोट भीग गए थे। पीछे फिरकर देखा। यह लाल बर्फ की चादर की तरह बिल्कुल स्तब्ध और सुन्न पड़ा था।
सब ओर सन्नाटा था। तल्लीलाल की बिजली की रोशनियाँ दीप-मालिका-सी जगमगा रही थीं। वह जगमगाहट दो मील तक फैले हुए प्रकृति के जलदर्पण पर प्रतिबिम्बित हो रही थी और दर्पण का काँपता हुआ, लहरें लेता हुआ, वह जल प्रतिबिम्बों को सौगुना, हजारगुना करके, उनके प्रकाश को मानो एकत्र और पूंजीभूत करके व्याप्त कर रहा था। पहाड़ों के सिर पर की रोशनाईयाँ तारों-सी जान पड़ती थीं।
हमारे देखते-देखते एक घने पर्दे ने आकर इन सबको ढँक दिया। रोशनियाँ मानो मर गई। जगमगाहट लुप्त हो गईं। वे काले-काले भूत-से पहाड़ भी इस सफेद पर्दे के पीछे छिप गए। पास की वस्तु भी न दीखने लगी। मानो यह घनीभूत प्रलय था। सब कुछ इस घनी गहरी सफेदी में दब गया। एक शुभ्र महासागर ने फैलकर संस्कृति के सारे अस्तित्व को डुबो दिया। ऊपर-नीचे, चारों तरफ वह निर्भय, सफेद शून्यता ही फैली हुई थी।

ऐसा घना कुहरा हमने कभी न देखा था। वह टप-टप टपक रहा था। मार्ग अब बिल्कुल निर्जन-चुप था। वह प्रवाह न जाने किन घोंसलों में जा छिपा था। उस बृहदाकार शुभ्र शून्य में कहीं से, ग्यारह बार टन-टन हो उठा। जैसे कहीं दूर कब्र में से आवाज आ रही हो। हम अपने-अपने होटलों के लिए चल दिए।
रास्ते में दो मित्रों का होटल मिला। दोनों वकील मित्र छुट्टी लेकर चले गए। हम दोनों आगे बढ़े। हमारा होटल आगे था।
ताल के किनारे-किनारे हम चले जा रहे थे। हमारे ओवरकोट तर हो गए थे। बारिश नहीं मालूम होती थी, पर वहाँ तो ऊपर-नीचे हवा से कण-कण में बारिश थी। सर्दी इतनी थी कि सोचा, कोट पर एक कम्बल और होता तो अच्छा होता ।
रास्ते में ताल के बिलकुल किनारे पर बेंच पड़ी थी। मैं जी में बेचैन हो रहा था। झटपट होटल पहुँचकर इन भीगे कपड़ों से छुट्टी पा, गरम बिस्तर में छिपकर सोना चाहता था पर साथ के मित्रों की सनक कब उठेगी, कब थमेगी-इसका पता न था। और वह कैसी क्या होगी – इसका भी कुछ अन्दाज न था। उन्होंने कहा-‘आओ, जरा यहाँ बैठें।’
हम उस चूते कुहरे में रात के ठीक एक बजे तालाब के किनारे उस भीगी बर्फ-सी ठंडी हो रही लोहे की बेंच पर बैठ गए।
पांच, दस, पन्द्रह मिनट हो गए। मित्र के उठने का इरादा न मालूम हुआ। मैंने खिसियाकर कहा
‘चलिए भी।’
‘अरे जरा बैठो भी।’
हाथ पकड़कर जरा बैठने के लिए जब इस जोर से बैठा लिया गया तो और चारा न रहा- लाचार बैठे रहना पड़ा। सनक से छुटकारा आसान न था, और यह जरा बैठना जरा न था, बहुत था।
चुपचाप बैठे तंग हो रहा था, कुढ़ रहा था कि मित्र अचानक बोले
‘देखो… वह क्या है?’
मैंने देखा-कुहरे की सफेदी में कुछ ही हाथ दूर से एक काली-सी सूरत हमारी तरफ बढ़ी आ रही थी। मैंने कहा ‘होगा कोई।’
तीन गज की दूरी से दीख पड़ा, एक लड़का सिर के बड़े-बड़े बालों को खुजलाता चला आ रहा है। नंगे पैर है, नंगा सिर । एक मैली-सी कमीज लटकाए हैं। पैर उसके न जाने कहाँ पड़ रहे हैं, और वह न जाने कहाँ जा रहा है- कहाँ जाना चाहता है। उसके कदमों में जैसे कोई न अगला है, न पिछला है, न दायां है, न बायां है।
पास ही चुंगी की लालटेन के छोटे-से प्रकाशवृत्त में देखा-कोई दस बरस का होगा। गोरे रंग का है, पर मैल से काला पड़ गया है। आँखें अच्छी बड़ी पर रूखी हैं। माथा जैसे अभी से झुर्रियाँ खा गया है। वह हमें न देख पाया। वह जैसे कुछ भी नहीं देख रहा था। न नीचे की धरती, न ऊपर चारों तरफ फैला हुआ हरा, न सामने का तालाब और न बाकी दुनिया। वह बस, अपने विकट वर्तमान को देख रहा था ।
मित्र ने आवाज दी- ‘ऐ’
उसने जैसे जागकर देखा और पास आ गया।
‘तू कहाँ जा रहा है?’
उसने अपनी सूनी आँखें फाड़ दीं।
‘दुनिया सो गई, तू ही क्यों घूम रहा है?”
बालक मौन-मूक, फिर भी बोलता हआ चेहरा लेकर खड़ा रहा।
‘कहाँ सोएगा?’
‘यहीं कहीं।’
‘कल कहाँ सोया था?’
‘दुकान पर।’
‘आज वहाँ क्यों नहीं?’
‘नौकरी से हटा दिया।’
‘क्या नौकरी थी?’
‘सब काम। एक रुपया और जूठा खाना!
‘फिर नौकरी करेगा?’
‘हाँ।’
‘बाहर चलेगा?’
‘हाँ।’
‘आज क्या खाना खाया?’
‘कुछ नहीं।’
‘अब खाना मिलेगा?’
‘नहीं मिलेगा!’
‘यों ही सो जाएगा?’
‘हाँ’
‘कहाँ।’
‘यहीं कहीं।’
‘इन्हीं कपड़ों में?’
बालक फिर आँखों से बोलकर मूक खड़ा रहा। आँखें मानो बोलती थीं-यह भी कैसा मूर्ख प्रश्न!
‘मां-बाप हैं?’
‘हैं।’
‘कहाँ?’
‘पन्द्रह कोस दूर गाँव में।’
‘तू भाग आया?’
‘क्यों ?’
‘मेरे कई छोटे भाई-बहिन हैं-सो भाग आया वहाँ काम नहीं, रोटी नहीं। बाप भूखा रहता था और मारता था’
माँ भूखी रहती थी और रोती थी। सो भाग आया। एक साथी और था। उसी गाँव का। मुझसे बड़ा था। दोनों साथ यहाँ आए। वह अब नहीं है।
‘कहाँ गया?’
‘मर गया।’
‘मर गया।’
‘मर गया?’
‘हाँ, साहब ने मारा, मर गया।
‘अच्छा, हमारे साथ चल।’
वह साथ चल दिया। लौटकर हम वकील दोस्तों के होटल में पहुँचे।
‘वकील साहब!’
वकील लोग होटल के ऊपर के कमरे से उतरकर आए। कश्मीरी दोशाला लेपेटे थे, मोजे-चढ़े पैरों में चप्पल थी। स्वर में हल्की-सी झुंझलाहट थी, कुछ लापरवाही थी।
‘आ-हा फिर आप! कहिए।’
‘आपको नौकर की जरूरत थी न? देखिए, यह लड़का है।’
‘कहाँ से ले आए? इसे आप जानते हैं?”
‘जानता हूँ-यह बेईमान नहीं हो सकता।’
‘अजी, ये पहाड़ी बड़े शैतान होते हैं। बच्चे-बच्चे में गुल छिपे रहते हैं। आप भी क्या अजीब हैं। उठा लाए कहीं से-लो जी, यह नौकर लो।’ ‘मानिए तो, यह लड़का अच्छा निकलेगा।’
ऐरे-गैरे को नौकर बना लिया जाए, अगले दिन वह न जाने क्या-क्या लेकर चम्पत
‘आप भी… जी, हो जाए!’
‘आप मानते ही नहीं, मैं क्या करूं?’
‘मानें क्या, खाक? आप भी… जी अच्छा मजाक करते हैं।… अच्छा, अब हम सोने जाते हैं।’ और वे चार रुपये रोज के किराये वाले कमरे में सजी मसहरी पर सोने झटपट चले गए।
वकील साहब के चले जाने पर, होटल के बाहर आकर मित्र ने अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ टटोला। पर झट कुछ निराश भाव से हाथ बाहर कर मेरी ओर देखने लगे।
‘क्या है?’
‘इसे खाने के लिए कुछ-देना चाहता था’ अंग्रेजी में मित्र ने कहा- ‘मगर, दस-दस के नोट हैं।’
‘नोट ही शायद मेरे पास हैं, देखें?’
सचमुच मेरे पाकिट में भी नोट ही थे। हम फिर अंग्रेजी में बोलने लगे। लड़के के दाँत बीच-बीच में कटकटा उठते थे। कड़ाके की सर्दी थी।
मित्र ने पूछा- ‘तब?’
मैंने कहा-‘दस का नोट ही दे दो।’ सकपकाकर मित्र मेरा मुँह देखने लगे-‘अरे यार! बजट बिगड़ जाएगा। हृदय में जितनी दया है, पास में उतने पैसे तो नहीं हैं।”
‘तो जाने दो, यह दया ही इस जमाने में बहुत है।’ मैंने कहा। मित्र चुप रहे। जैसे कुछ सोचते रहे। फिर लड़के से बोले-‘अब आज तो कुछ नहीं हो सकता। कल मिलना। वह ‘होटल डी पब’ जानता है? वहीं कल दस बजे मिलेगा?’
‘हाँ, कुछ काम देंगे हुजूर?’
‘हाँ, हाँ, ढूँढ दूंगा।’
‘तो जाऊँ?’
‘हाँ,’ ठंडी सांस खींचकर मित्र ने कहा-‘कहाँ सोएगा?’
‘यहीं कहीं बेंच पर, पेड़ के नीचे किसी दुकान की भट्ठी में।’
बालक फिर उसी प्रेत-गति से एक ओर बढ़ा और कुहरे में मिल गया। हम भी होटल की ओर बढ़े। हवा तीखी थी। हमारे कोटों को पार कर बदन में तीर-सी लगती थी।

सिकुड़ते हुए मित्र ने कहा-‘भयानक शीत है। उसके पास कम-बहुत कम कपड़े हैं।’ ‘यह संसार है यार!’ मैंने स्वार्थ की फिलासफी सुनाई-‘चलो, पहले बिस्तर में गर्म हो लो, फिर किसी और की चिन्ता करना।’

उदास होकर मित्र ने कहा-‘स्वार्थ!-जो कहो, लाचारी कहो, निष्ठुरता कहो, बेहयाई !”
दूसरे दिन नैनीताल- स्वर्ग के किसी काले गुलाम पशु के दुलारे का वह बेटा- वह बालक, निश्चित समय पर हमारे होटल डि पव’ में नहीं आया। हम अपनी नैनीताल की सैर खुशी-खुशी खत्म कर चलने को हुए। उस लड़के की आस लगाते बैठे रहने की जरूरत हमने न समझी।
मोटर में सवार होते ही थे कि यह समाचार मिला कि पिछली रात, एक पहाड़ी बालक सड़क के किनारे, पेड़ के नीचे, ठिठुरकर मर गया ! मरने के लिए उसे वही जगह, वहीं दस बरस की उम्र और वहीं काले चिथड़ों की कमीज मिली। आदमियों की दुनिया में बस यही उपहार उसके पास छोड़ा था। पर बताने वालों ने बताया कि गरीब के मुँह पर, छाती, मुट्ठी और पैरों पर बरफ की हल्की-सी चादर चिपक गई थी। मानो दुनिया की बेहयाई ढकने के लिए प्रकृति ने शव के लिए सफेद और ठण्डे कफन का प्रबन्ध कर दिया था।
सब सुना और सोचा, अपना-अपना भाग्य।

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